सिमला समझौता ओर भारत पाकिस्तान के संबंध सुधारणे के लिये इंदिरा गांधी का प्रयास

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शिमला समझौताShimla Agreement

Shimla Agreement – बांगलादेश के धरती पे हुए अपमानजनक पराभव से पाकिस्तानी सेना कि हालत बहुत खस्ता हो गई थी । इसी संधी का फायदा भारत ने उठाया होता तो पाकिस्तान के हालात बहुत गंभीर बन जाते, लेकीन भारत ने कभी भी किसी के जमि पर कब्जा करणे का नही सोचा इसी कारण से ढाका मे पाकिस्तानी सेना ने समर्पण करणे के दुसरे दिन ही भारत ने पश्चिम सीमा पर युद्ध को रोकने का फैसला लिया । इसी शस्रसंधी को पाकिस्तान ने तुरंत कबुल किया..

भारत कि तरफ से संबंध सुधारणे के लिये प्रयास

पाकिस्तान के साथ इस तरह युद्ध कि समाप्ती होणे से इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारणे के लिये प्रयास कि शुरुवात कि, जिसके कारण नीचे दिये गये है –

1) भारत कभी भी युद्ध से किसी के क्षेत्र को हासील करणे के पक्ष मे नही था । अपने पडोशी राष्ट्र के साथ मित्रता के रिश्ते रहने कि इच्छा भारत ने हमेशा रखी थी इसी के साथ भारत ने आंतरराष्ट्रीय शांतता निर्माण करणे के लिये अपने प्रयास जारी रखे, ओर पाकिस्तान के साथ भी भारत के शीर्ष नेतृत्व ने रिश्ते सुधारणे पर जोर दिया ।

2) उसी वक्त दक्षिण आशिया के क्षेत्र मे शांतता बनी रहे यही हमारे परराष्ट्र नीती का उदिष्ट था । वो साध्य करणे के लिये इस रिजन के सभी देशो के साथ बेहतर रिश्ते प्रस्तापित करणा जरुरी हो गया था ।

3 ) भारत ने पाकिस्तान के साथ युद्ध जीत लिया था, लेकीन भारत को पता था कि युद्ध जितने से किसी भी समस्या का हल नही हो सकता , इसकी इंदिरा जी को भी कल्पना थी । ओर दो पडोशी देशो के बीच बातचीत से विभिन्न समस्याओ का निराकरण हो सकता है ।

4 ) भारत और पाकिस्तान के बीच हर समय तनाव के संबंध रहने से दक्षिण एशिया में दक्षिण एशियाई विभाग और भारतीय उपखंड अशांत क्षेत्र बन कर उभर सकते थे।  इसी स्थिति का फायदा उठाकर बाहर कि शक्तियो को भारतीय राजनीती में हस्तक्षेप करने का मोका मिल सकता था। इसी स्थिति की जानकारी इंदिरा जी को होणे से इंदिरा जी नहीं चाहती थी, कि ऐसी शक्तियों को इस तरह कि स्थिति उत्पन्न होने में मदद हो सके। इसी वजह से इंदिरा जी ने सिमला समझोते कि पेशकश की

सिमला समझोता – Shimla Agreement 28 जून से 2 जुलाई 1972

उपर दिये गये कूच वजह से इंदिरा जी ने पाकिस्तान से वार्ता करणे के लिये तत्परता दिखाई। बांग्लादेश के युद्ध के बाद पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन होकर जुल्फिकार अली भुट्टो पंतप्रधान पदी चुने गये थे। उन्होंने भारत के साथ बातचीत करने की इच्चा भी व्यक्त की। तदनुसार, दोनों प्रधानमंत्रियों ने भारत के शिमला में मुलाकात की। उनकी लंबी वार्ता 28 जून से  2 जुलाई 1972 के बीच हुई। चर्चा के अंत में, इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच एक समझौता हुआ. इसी भारत और पाकिस्तान के करार को शिमला समझौता ( Simla agreement ) कहा जाता है।

बातचीत के माध्यम से विवादास्पद मुद्दों को हल करने की स्वीकृति

शिमला समझौते का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि…..

 1 ) भारत और पाकिस्तान बातचीत के माध्यम से अपने मतभेदों को हल करने के लिए सहमत हुए।

२ ) बांग्लादेश युद्ध के दौरान, भारत ने पश्चिम पाकिस्तान के जिस क्षेत्र को जीत लिया था वो वापस देणे के लिये भारत ने अपनी तत्परता व्यक्त की थी।

3) दोनों देश जम्मू और कश्मीर में नियंत्रण रेखा के रूप में 17 दिसंबर 1971 के संघर्ष विराम के दिन मौजूद सीमा को LOC के लिए सहमत हुए।

4) इसके अलावा, दोनों देश एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के लिए आपसी सम्मान, आर्थिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में एक दूसरे के साथ सहयोग जैसे मुद्दों पर भी सहमत हुए। शिमला समझौते ने कुछ समय के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम कर दिया था।

शिमला समझौते के बाद द्विपक्षीय संबंध

भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौते के बाद भी, दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य नहीं हो सके। इसका एक मुख्य कारण यह था , कि पाकिस्तान हमेशा से भारत के बारे में अडिग रहा है। पाकिस्तान के सभी शासकों को अपनी शक्ति बनाए रखने और मजबूत करने के लिए भारत की शत्रुता बनाए रखने की आवश्यकता महसूस होती है। अब तक पाकिस्तानी लोगों को लगातार जागरूक करने के लिए और आंतरिक सवाल से वहां के लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश करने के लिए किया जाता रहा है।

पाकिस्तानी लोगों को जागरूक करने के लिए सभी पाकिस्तानी शासकों की यही नीति रही है। भारत के साथ शत्रुता बनाए रखने के लिए, पाकिस्तानी शासक अन्य पश्चिमी देशों की मदद से खुद को आज़माने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए, वे सभी प्रकार के हथियारों को इकट्ठा करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यह नीति भारत को आत्मरक्षा में युद्ध के लिए तैयार करने के लिए भी मजबूर करती है, जिससे दोनों देशों के बीच संदेह का माहौल पैदा होता है।

कश्मीर प्रश्न पर असहज भूमिका

कश्मीर मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को सामान्य बनाने में एक बड़ी बाधा है। यही पाकिस्तान कह रहा है। इस संबंध में उनकी भूमिका हमेशा हठ की रही है। जैसा कि आपने शुरू में ही समझाया था, पाकिस्तान यह मानने को तैयार नहीं है कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय पूरी तरह से वैध है। यद्यपि उन्होंने शिमला समझौतेShimla Agreement के तहत द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से कश्मीर मुद्दे को हल करने की इच्छा व्यक्त की है, उन्होंने समय-समय पर कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में उठाया है। बेशक, उन्हें इससे ज्यादा सफलता नहीं मिली।

भारत के बारे मे संघर्ष ओर अविश्वास कि भावना

पाकिस्तान की विदेश नीति का एक पहलू यह भी है कि, इसने भारत के प्रति हमेशा संघर्ष और विश्वासघात की नीति अपनाई है। भारत की संप्रभुता को खतरा पैदा करने वाली कार्रवाई करने में पाकिस्तान हमेशा सबसे आगे रहा है। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, चाहे कोई भी सरकार पाकिस्तान में आए, भारत के प्रति नीति में कोई अंतर नहीं होता। भारत का विरोध करना पाकिस्तान के सभी शासकों का सामान्य सूत्र है। इतिहास से पता चला है कि पाकिस्तान के हर शासक ने भारत से नफरत के आधार पर अपनी राजनीती मजबूत करने की कोशिश की है।

 

 

 

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